केशकाल में महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव की धूम।जिनशासन महिला संगठन के द्वारा चार दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन।

केशकाल/महफूज़ अली/30मार्च2026–केशकाल में हर वर्ष की भाति इस वर्ष भी महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है , समाज की जिनशासन महिला संगठन के द्वारा  चार दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया है जिसमें 28/03/2024 से 31/03/2026महावीर जन्म कल्याणक तक सुबह 5.30 से 7.00 भव्य शोभायात्रा विभिन्न स्थानों पर निकालकर अहिंसा और परमो धर्म का संदेश दिया वहीं दुसरी और समाज के लिए शर्बत का वितरण किया गया है, और अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके परिवारजनों के लिए  खिचड़ी का वितरण किया गया है , जिनशासन महिला संगठन की सभी महिलाओं ने हर कार्यक्रम में बढ़ चढ़ कर  हिस्सा लिया , साथ ही  30 मार्च के सध्या में भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव की तहत सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन ओसवाल भवन में आयोजित किया गया है,  तथा 31मार्च को भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव पर पुरे दिन का कार्यक्रम का आयोजन कर शांति,अहिंसा ,और जैन धर्म के प्रति  भगवान महावीर के उपदेशों को जन जन तक पहुंचाने के लिए और भी विभिन्न आयोजन किया गया है , जिसमें समाज के पुरुषों और बच्चों एवं महिलाओं में अलग ही उत्साह और आनन्द का माहौल है , भगवान महावीर जन्म मानव कल्याण तथा अपने अन्दर ही भगवान को  तराशने तथा राग,देष,  से रहित समभाव बनाने तथा विश्व कल्याण की भावना रखना ही भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव का उद्देश्य है , भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक (महावीर जयंती) जैन धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण उत्सव है। यह पर्व सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह के अग्रदूत, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्म के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।भगवान महावीर का जन्म चैत्र शुक्ल तेरस के दिन जन्म और बाल्यकाल
भगवान महावीर का जन्म आज से लगभग 2600 वर्ष पूर्व (ईसा पूर्व 599) चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन कुंडलपुर (वर्तमान बिहार) में हुआ था।
माता-पिता: उनके पिता महाराजा सिद्धार्थ और माता महारानी त्रिशला थीं।
कुल: वे इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रियबचपन का नाम: जन्म के बाद राज्य में हुई सुख-समृद्धि के कारण उनका नाम ‘वर्धमान’ रखा गया। अदम्य साहस और वीरता के कारण उन्हें ‘महावीर’ कहा गया।वैराग्य और कठिन तपस्या
राजसी वैभव और सुखों के बीच रहने के बावजूद वर्धमान का मन संसार में नहीं लगा। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने दीक्षा ली और सब कुछ त्याग कर आत्म-कल्याण के मार्ग पर निकल पड़े।
मौन साधना: उन्होंने 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिसमें उन्होंने लंबे समय तक मौन धारण किया और घोर कष्ट सहे।
केवल ज्ञान: 12 वर्षों की कठिन साधना के बाद, ऋजुबालिका नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे उन्हें ‘केवल ज्ञान’ (पूर्ण ज्ञान) की प्राप्ति हुई। इसके बाद वे ‘जिन’ (विजेता) कहलाए।
3. भगवान महावीर के पंच महाव्रत
ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर स्वामी ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और जीवों पर दया करने का संदेश दिया। उन्होंने पाँच सिद्धांतों पर जोर दिया:
अहिंसा: मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना।
सत्य: हमेशा हितकारी और मधुर सत्य बोलना।
अचौर्य: बिना अनुमति के किसी की वस्तु न लेना (चोरी न करना)।
ब्रह्मचर्य: पवित्रता का पालन करना।
अपरिग्रह: अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह न करना।
महावीर जयंती के दिन देशभर के जैन मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं:
प्रभात फेरी और जुलूस: भगवान की प्रतिमा को रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाता है।
अभिषेक और पूजा: मंदिरों में भगवान का कलशाभिषेक और विशेष पूजन किया जाता है।
दान-पुण्य: इस दिन गरीब और जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और औषधि दान करने का विशेष महत्व है।
जीव दया: पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करना और अहिंसा के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना।
“जियो और जीने दो” — यह भगवान महावीर का सबसे मुख्य संदेश था, जो आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है।

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