निसंतान को संतान देने वाली लिंगेश्वरी गुफा मंदिर का द्वार खुलेगा 18 सितंबर को

केशकाल। महफूज़ अली–(बस्तर संभाग के प्रसिद्ध साहित्यकार की कलम से)–विगत 40 वर्षो से साल में एक बार खुलने वाला आलोर की पहाड़ी गुफा पर स्थित माँ लिंगेश्वरी मंदिर का द्वार इस साल 18 सितंबर 2024 बुधवार को खुलेगा । उल्लेखनीय है, कि देवताओं की धार्मिक आस्था के लिए पूरे विश्व में प्रख्यात बस्तर की खूबसूरत वादियों में शिव और पार्वती के समन्वित रूप के कारण -इसे लिगई माता के अवतार में माता लिंगेश्वरी मानकर पूजा अर्चना करते है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 200 किमी जगदलपुर सड़क मार्ग पर फरसगाँव के बायी ओर बने गुरूद्वारा के थोड़ा आगे दायी ओर दंतेश्वरी माई प्रवेश द्वार से मात्र 8 किमी मे बडे डोगर के पहले झाटीबन आलोर के पहाड़ों के बीच एक गुफा में मां लिंगेश्वरी विराजमान है, जहां हर वर्ष हजारों की संख्या में भक्त अलग-अलग राज्य- मध्य प्रदेश, राजस्थान उड़ीसा, महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश,दिल्ली से भी आदि जैसे अनेक राज्य से इच्छा पूर्ति की कामना को लेकर दर्शन करने आते हैं।मुख्य रूप से अधिकांश निसंतान दंपती संतान की प्राप्ति के लिए माता के दर्शन करने आते हैं। बस्तर पुरातत्व समिति सचिव लोकेश गायकवाड केशकाल छत्तीसगढ निवासी जिनका सम्पर्क नंबर -8602374578 ने जानकारी मे बताया कि पूरा बस्तर संभाग क्या पूरा विश्व शिव स्वरूप पत्थरो भरा पडा है.. जिसे हम शिवलिंग के रूप मे पूजन करने है.. वही बूढा देव के नाम से वहा के निवासी मानते है.. व केवल निसंतान नही, घर निर्माण, बच्चो की शादी,नौकरी, शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के ठीक होने की प्रार्थना लेकर लोग जब आते है.. व दर्शन की एक लाइन होने के कारण भीड़ बढ जाती है। सबको याद होगा कोरोना काल के चलते गुफा के द्वार खोला गया था ..लेकिन दर्शनार्थियों को माता के दर्शन नही कराया गया। मतलब यह है कि माता जी जब से विराजित है.. पूजन कार्य कभी नही रूका है। इस बार श्रद्धालुओं के लिए 18 सितंबर 2024 बुधवार को प्रातः 5 बजे दर्शन हेतु खोला जायेगा, और जब तक अंतिम व्यक्ति को दर्शन न हो भले रात के 9 भी बज जाएगे दर्शन चालू रहेगा

=इस बार भी बाहर से करना होगा दर्शन=

समिति के पदाधिकारियों ने बताया– कि मंदिर में भक्तों का प्रवेश पर रोक लगा दिया गया है। श्रद्धालुओं को मंदिर के बाहर से ही माता के दर्शन करने होंगे। श्रद्धालुओं को माता लिंगेश्वरी मेला का बड़ी बेसब्री इन्तजार रहता है। चर्चा के दौरान गायकवाड जी ने बताया कि वे विगत 1991 से लगातार मंदिर मे माता जी का दर्शन करने आ रहे है, विवाह 1998 मे होने के बाद 1999 मे जब वे आलोर पहुचे तब गुफा के भीतर पंजो के सहारे बैठकर खीरा को मूर्ति से टच कर अंदर गुफा के भीतर ही खाए और सन 2000 मे माता के आशीर्वाद से पहली बिटिया यशस्वी का जन्म हुआ। उन्होने बताया कि 1991 से 2023 तक अर्थात इन 32 वर्षो मे प्रतिवर्ष 5 जोडे की औसत से लगभग 160 जोडो का दर्शन मैने कराया है.. तो आज लगभग 100 जोडो को पुत्र या पुत्री की प्राप्ति हुई है, सबसे अधिक 17 वर्ष के बाद शादी के जोडे की भी माता जी ने झोली भरी है। मंदिर समिति मे माननीय नीलकंठ टेकाम जी विधायक केशकाल के सफल नेतृत्व मे रामलाल कोरार्म, रवि घोष जी , डा धनराज कुलदीप, ईश्वर कोर्राम व नगर पंचायत अध्यक्ष ,उपाध्यक्ष व सभी पार्षद नगर पंचायत फरसगाँव सैकड़ो ग्राम वासीयो का सहयोग पुलिस प्रशासन, पंचायत झाटी बंध का विशेष योगदान रहता है, आलोर का एक और महत्व है कि जब दिन भर पूजा-पाठ कर शाम को लिगई माता के चारो ओर सफाई कर रेत बिछा देते है और गुफा का द्वार बंद कर दिया जाता है तो आगामी वर्ष मूर्ति के चारो ओर किसी न किसी जन्तु के पैरो का निशान बन जाता है और वही निशान बस्तर का पंचाग तय करता है।और वह भविष्य वाणी तय करता है।

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