लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की 151वी जयंती पर निकाली गई रन फॉर यूनिटी रैली में केशकाल विधायक संग सैकड़ों लोग हुए शामिल।

SDM केशकाल सुश्री आकांक्षा नायक,थाना प्रभारी विकाश बघेल एवं सभी विभाग के अधिकारी रहे शामिल।

हजारों स्कूलों के बच्चों के द्वारा लगाए जा रहे,लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के जयकारों से गूंज उठा केशकाल।

राष्ट्रीय एकता दिवस विशेष: 151वीं जयंती पर याद किए गए ‘लौह पुरुष’, गृह मंत्री के रूप में अखंड भारत के निर्माण की गाथा नीचे की तरफ जरूर पढ़ें।

महफूज़ अली/केशकाल/31अक्टूबर2026–31 अक्टूबर 2026 भारत के लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर केशकाल में भव्य रन फॉर यूनिटी रैली निकाली गई रैली में केशकाल के विधायक नीलकंठ टेकाम केशकाल एसडीएम सुश्री आकांक्षा नायक केशकाल थाना प्रभारी विकास बघेल, नगर पंचायत केशकाल अध्यक्ष बिहारीलाल शोरी,वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण दत्त उपाध्याय,पार्षद भूपेश चंद्राकर भाजपा नेता दुर्गेश कौशिक,सेम टी सभी स्कूलों के शिक्षक प्राचार्य विभाग प्रमुख रन फॉर यूनिटी रैली में शामिल हुए लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के जयकारों से केशकाल गूंज उठा केशकाल शहर के लगभग सभी स्कूलों के बच्चों ने रन फॉर यूनिटी रैली में भाग लिया विधायक नीलकंठ हाँथ में तिरंगा लेकर बच्चों संग लौह पुरुष वल्लभ भाई पटेल के जयकारे लगाए।

रन फॉर यूनिटी की रैली जब बस स्टैंड केशकाल पहुंची तो सभा के रूप में तब्दील हो गई जहां केशकाल विधायक नीलकंठ ने केशकाल क्षेत्र के समस्त स्कूलों से आए बच्चों का हौसला अफजाई किया। एवं सभी बच्चों के लिए तालियां बजवाई उन्होंने लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के जीवन पर प्रकाश डाला एवं लौह पुरुष के द्वारा भारत वर्ष में दिए गए योगदान के बारे में बताया।


31 अक्टूबर 2026 को देश भर में भारत के ‘लौह पुरुष’ और आधुनिक भारत के शिल्पकार सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती बेहद गरिमा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। इस ऐतिहासिक अवसर को पूरा देश ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ (National Unity Day) के रूप में मना रहा है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी। गुजरात के एकतानगर में स्थित विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा ‘Statue of Unity’ के साए में आज भव्य ‘एकता परेड’ और ‘भारत पर्व’ जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जहाँ देश की विविधता और ताकत की झलक देखने को मिल रही है।

संघर्ष से सफलता तक: बैरिस्टर से ‘सरदार’ बनने का सफर

31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे वल्लभभाई पटेल का शुरुआती जीवन कड़े संघर्षों में बीता। उनके भीतर सीखने की ऐसी ललक थी कि 36 वर्ष की परिपक्व उम्र में वे कानून की पढ़ाई करने लंदन गए। वहाँ उन्होंने अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय देते हुए 36 महीने के बैरिस्टरी कोर्स को मात्र 30 महीने में अव्वल दर्जे के साथ पूरा किया।
भारत लौटकर उन्होंने अहमदाबाद में एक सफल वकालत शुरू की, लेकिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने ऐशो-आराम की जिंदगी छोड़ दी और देश की आजादी के आंदोलन में कूद पड़े।
• खेड़ा सत्याग्रह (1918): अकाल के समय ब्रिटिश सरकार के जबरन टैक्स वसूलने के खिलाफ गांधी जी के साथ मिलकर किसानों को न्याय दिलाया।
• बारडोली सत्याग्रह (1928): बढ़े हुए लगान के खिलाफ किसानों के इस आंदोलन का उन्होंने ऐसा कुशल नेतृत्व किया कि इसकी सफलता के बाद महात्मा गांधी ने उन्हें ‘सरदार’ (नेता) की उपाधि से नवाजा।
इसके बाद वे राष्ट्रीय पटल पर उभरे और 1931 के ऐतिहासिक कराची अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, जहाँ देश के लिए मौलिक अधिकारों का प्रस्ताव पारित हुआ।

560+ रियासतों का विलय: ऐसे बने ‘अखंड भारत’ के निर्माता

15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, तब अंग्रेजों ने भारत को भौगोलिक रूप से खंडित करने की एक बड़ी साजिश रची थी। देश के सामने 560 से अधिक स्वायत्त रियासतों (Princely States) को भारत संघ में शामिल करने की एक लगभग असंभव चुनौती थी।
स्वतंत्र भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभालते ही सरदार पटेल ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और कूटनीति का परिचय दिया। उन्होंने ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की नीति अपनाते हुए बिना किसी बड़े खून-खराबे के सभी रियासतों का भारत में विलय कराया। जूनागढ़, हैदराबाद (ऑपरेशन पोलो) और जम्मू-कश्मीर जैसी बेहद जटिल रियासतों के मामलों को भी उन्होंने कड़े प्रशासनिक फैसलों से सुलझाया। यही कारण है कि उन्हें ‘भारत का बिस्मार्क’ और ‘लौह पुरुष’ कहा जाता है, जिनके बिना आज के एकीकृत भारत की कल्पना भी असंभव थी।

प्रशासनिक तंत्र के मार्गदर्शक: सिविल सेवकों को दिया ‘स्टील फ्रेम’ का नाम

सरदार पटेल न केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी नीति-निर्माता भी थे। आजादी के बाद देश की प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए उन्होंने ब्रिटिश कालीन प्रशासनिक सेवा का पुनर्गठन किया और आधुनिक अखिल भारतीय सेवाओं (IAS और IPS) की नींव रखी।
सिविल सेवा के अधिकारियों को देश को एकता के सूत्र में बांधने की जिम्मेदारी सौंपते हुए उन्होंने उन्हें ‘अ स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया’ (भारत का फौलादी ढांचा) कहा था। प्रशासनिक सुधारों में उनके इसी अमूल्य योगदान के कारण उन्हें आज भी ‘पेट्रन सेंट ऑफ सिविल सर्वेंट्स’ (सिविल सेवकों के संरक्षक संत) के रूप में याद किया जाता है।
आज उनकी 151वीं जयंती पर पूरा देश राष्ट्र के प्रति उनके इस अतुलनीय समर्पण और कृतज्ञता को नमन कर रहा है।

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